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Thursday, April 12, 2012

क्या झुठला दी जाएगी आइंस्टीन की थ्योरी



वैज्ञानिकों ने ऐसा कण खोज निकाला है जो रोशनी की रफ्तार से भी तेज भाग सकता है. यानी यह आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी को गलत साबित करता है. इस थ्योरी के मुताबिक , कोई भी चीज रोशनी से तेज नहीं भाग सकती. लेकिन न्यूट्रिनो नाम के जिस कण को खोजा गया है , उसकी स्पीड लाइट से भी तेज पाई गई है.
क्या है न्यूट्रिनो- यह एटम के भीतर छिपे कण हैं जिन्हें न्यूट्रिनो नाम से जाना जाता है. असल में न्यूट्रिनो इतने महीन कण हैं कि कुछ समय पहले ही यह पता चल पाया कि इनमें भार भी होता है. जब इनकी स्पीड चेक की गई तो पता लगा कि ये लाइट की स्पीड से भी तेजी से आगे बढ़ते हैं।
अगर वैज्ञानिकों की यह खोज सही साबित होती है तो आइंस्टीन की थ्योरी खारिज हो जाएगी। न्यूट्रिनो का यह टेस्ट यूरोपियन न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर ( सर्न ) और इटली की एक लैबरटरी ने मिलकर किया था। इसमें पाया गया कि न्यूट्रिनो की रफ्तार 3 लाख और 6 किलोमीटर प्रति सेकंड है. यानी यह लाइट की स्पीड से छह किलोमीटर प्रति सेकंड ज्यादा है.


नहीं था नतीजे का अंदाजा – प्रयोग में शामिल रहे भौतिकी विशेषज्ञ एन्टोनियो इरेडितातो ने कहा कि इस नतीजे से हम बेहद हैरान हैं क्योंकि हम तो सिर्फ न्यूट्र्रिनो की स्पीड मापना चाहते थे. किसी को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि कुछ खास नतीजे भी हासिल हो सकते हैं. वैसे वैज्ञानिकों ने इन नतीजों की पुष्टि करने के लिए छह महीनों का वक्त लिया और फिर इसकी घोषणा की.
अब उनका मानना है कि इन नतीजों से फिजिक्स को लेकर चली आ रही हमारी धारणा में थोड़ा बदलाव जरूर आएगा.क्रांतिकारी नतीजे फें्रच वैज्ञानिक पियरी बिनेट्रॉय ने इन नतीजों को क्रांतिकारी बताते हुए कहा कि अगर लोग इसे स्वीकार करते हैं तो फिजिक्स के एक्सपर्ट्स को वापस अपने सिद्धांत दुरुस्त करने होंगे. वहीं, दूसरी ओर प्रयोग में शामिल रहे अलफॉन्स वेबर ने कहा कि इसमें किसी चूक की भी गुंजाइश हो सकती है , इसलिए हम थोड़ा सतर्क हैं.
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बिन चश्मा थ्री डी मोबाइल

अवतार और एलिस इन वंडरलैंड जैसी थ्रीडी फिल्मों की पॉप्युलैरिटी ने दिखा दिया है कि आने वाला जमाना थ्रीडी तकनीक का ही है। लोगों की इस नब्ज को भांपकर जापान की इलेक्ट्रॉनिक कंपनी शार्प ने ऐसे थ्रीडी फोन बनाने का ऐलान किया है जिनका मजा बिना स्पेशल चश्मों के उठाया जा सकेगा। 

हाल ही में इस कंपनी ने तीन इंच का एलसीडी डिस्प्ले स्क्रीन पेश किया था जिसमें बिना चश्मे के थ्रीडी एनिमेशन दिखाई दिया। इसके अलावा एक ऐसा टच पैनल स्क्रीन भी लोगों की नजर किया गया जिसमें आप एक थ्रीडी फोटो को फ्लिक करके दूसरे थ्रीडी फोटो तक जा सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे किसी किताब के पन्ने पलटे जाते हैं। इसी तरह की थ्रीडी तकनीक वाला एक कैमकॉर्डर भी लोगों के सामने रखा गया जिसमें शूट किए गए विडियो थ्रीडी में दिख रहे थे। 

ये थ्रीडी इमेज स्क्रीन से 12 इंच की दूरी तक बिना चश्मे के देखे जा सकती हैं। इस तकनीक को इस तरह डिवेलप किया गया है कि स्क्रीन पर दिखने वाली इमेज दोनों आंखों को अलग-अलग किस्म की दिखाई देती है। इस वजह से इस तरह का भ्रम पैदा होता है कि हम कोई थ्रीडी फोटो देख रहे हैं। 

यह इलेक्ट्रॉनिक कंपनी 2002 से थ्रीडी प्रॉडक्ट पर काम कर रही है। हालांकि, शुरू में समस्या खराब तस्वीर, रिजॉल्यूशन और ब्राइटनैस की रही है। मोबाइल फोन के अलावा इस नई तकनीक को इलेक्ट्रॉनिक डायरीज और डिजिटल कैमरों में इस्तेमाल किया जाएगा। ये अनोखे डिवाइस जापान में इसी साल सितंबर से मिलने लगेंगे।
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विंडोज 8 ने बदली तकनीक


विंडोज 8 ने बदली तकनीक


माइक्रोसॉफ्ट ने यूजर इंटरफेस का डिजाइन बदला तो है ही, उसने यह भी सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि उसमें पूरी बैकवर्ड कम्पैटिबिलिटी हो। इस पर विंडोज 7 के सभी एप्लिकेशन चलते हैं और विंडोज 7 से इसमें अपग्रेड करने में कोई दिक्कत नहीं होगी। विंडोज 7 पर चलने वाले सभी हार्डवेयर इस पर भी चलेंगे। इसमें कम्पैटिबिलिटी को लेकर कोई दिक्कत नहीं आएगी और न ही इसमें अतिरिक्त ड्राइवर की जरूरत होगी.
दो साल पहले लॉन्च किए गए विंडोज 7 ने खुद को माइक्रोसॉफ्ट का अब तक का सबसे टिकाऊ ऑपरेटिंग सिस्टम साबित किया है. अब माइक्रोसॉफ्ट ने विंडोज 8 लॉन्च किया है, जिसका मकसद न सिर्फ अपनी पुरानी कामयाबी को दोहराना बल्कि कंप्यूटर चलाने के तौर-तरीके में बदलाव लाना है.
बैकवर्ड कम्पैटिबिलिटी
माइक्रोसॉफ्ट ने यूजर इंटरफेस का डिजाइन बदला तो है ही, उसने यह भी सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि उसमें पूरी बैकवर्ड कम्पैटिबिलिटी हो। इस पर विंडोज 7 के सभी एप्लिकेशन चलते हैं और विंडोज 7 से इसमें अपग्रेड करने में कोई दिक्कत नहीं होगी। विंडोज 7 पर चलने वाले सभी हार्डवेयर इस पर भी चलेंगे। इसमें कम्पैटिबिलिटी को लेकर कोई दिक्कत नहीं आएगी और न ही इसमें अतिरिक्त ड्राइवर की जरूरत होगी.
नया  मेट्रो  इंटरफे
इसके पूरी तरह नए  मेट्रो  इंटरफेस में विंडोज फोन 7 की तरह का टाइल लेआउट है. इसको टच स्क्रिन के लायक बनाया गया है, लेकिन इसका इस्तेमाल माउस और कीबोर्ड से भी किया जा सकेगा। इसके टाइल लाइव हैं और इंटरनेट से कनेक्ट होने पर जरूरी सूचनाएं अपने आप लेकर अपडेट हो जाते हैं। इसमें स्वाइप से नेविगेशन किया जा सकता है और ज्यादातर एप्लिकेशन डिफॉल्ट पर फुल स्क्रीन मोड में चलते हैं। इसमें दो एप्लिकेशन दाएं-बाएं एक साथ चलाए जा सकते हैं.
10 सेकंड में चालू होता है
विंडोज 8 जल्द स्टार्ट और शट डाउन किया जा सकता है. ज्यादातर नए पीसी पर यह 10 सेकंड में स्टार्ट हो सकता है। विंडोज समूचे सिस्टम को बंद करने के बजाय कुछ एलीमेंट को हाइबरनेट करता है। जब आप अपना पीसी स्टार्ट करेंगे तो ये एलीमेंट एक्टिव हो जाएंगे। आप को इनको नए सिरे से ओपन नहीं करना पड़ेगा। इससे स्टार्ट होने में लगने वाला समय घटता है. इसके अलावा विंडोज 8 बूट साइकल के दौरान प्रोसेसर के सभी कोर का इस्तेमाल करता है.
नया विंडोज एक्सप्लोरर
विंडोज 8 के एक्सप्लोरर में ऑफिस 2010 का रिबन इंटरफेस लिया गया है. प्रिव्यू विंडो को वाइडस्क्रीन डिसप्ले के प्रभावी इस्तेमाल के लिए नए सिरे से डिजाइन किया गया है. ये अब तो लैपटॉप और डेस्कटॉप के लिए आम हो गए हैं. आपने कुछ छोटे मोटे बदलाव देखे होंगे जैसे न्यू फाइल कॉपी इंटरफेस, जो आपको कॉपी के बीच में प्रोसेस को रोकने की सुविधा देगा. इसके अलावा नया इंटरफेस डुप्लीकेट फाइल नेम को रिप्लेस या रीनेम के लिए ज्यादा विकल्प मुहैया कराएगा.
टचस्क्रीन सेलेक्शन में आसानी
विंडोज 8 को देखने पर ऐसा लगता है कि इसे टचस्क्रीन के साथ इस्तेमाल के लिए बनाया गया है. मेट्रो टाइल से लैस एकदम नए स्टार्ट स्क्रीन का नेविगेशन स्वाइप में सबसे अच्छा काम लिया जा सकता है. बड़े टाइल होने से टचस्क्रीन सेलेक्शन में आसानी होती है। लॉक स्क्रीन को अनलॉक करने के लिए स्वाइप अप करना पड़ेगा। यह स्मार्ट फोन के स्क्रीन की अनलॉकिंग के तरीके जैसा है. यह फीचर वेंडर्स को टचस्क्रीन नोटबुक लॉन्च करने के लिए प्रेरित कर सकता है.
टैबलेट और पीसी के लिए एक ऑपरेटिंग सिस्टम
माइक्रोसॉफ्ट ने कहा है कि विंडोज 8 स्टैंडर्ड इंटेल और एएमडी प्रोसेसर के अलावा एआरएम प्रोसेसर पर भी काम करेगा जिसका इस्तेमाल टैबलेट में किया जाता है.
माइक्रोसॉफ्ट की फ्री ऑनलाइन स्टोरेज सुविधा स्काईड्राइव एंटीग्रेशन की मदद से विंडोज 8 अपने आप सभी डॉक्यूमेंट, पिक्चर और क्लाउड कंप्यूटिंग में उपलब्ध दूसरे ऑनलाइन कंटेंट को सिंक कर सकते हैं. इसलिए अगर आप अपने पीसी, लैपटॉप या टैबलेट पर विंडोज 8 चलाना चाहते हैं तो आपकी सभी पुरानी सेटिंग और फाइल आपको तब तक उपलब्ध होगी जब तक आप इंटरनेट के जरिए स्काईड्राइव को एक्सेस कर सकेंगे.
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Tuesday, April 10, 2012

एलियंस की खोज के लिए वेबसाइट लॉंच

क्या इस ब्रह्माण्ड में मनुष्यों के अलावा एलियन या दूसरे प्राणी भी रहते हैं इस बात को लेकर कई वर्षों से विवाद बना हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि एलियन होते हैं तो कुछ लोग इसे कोरी कल्पना क़रार देतें हैं। यहां तक की वैज्ञानिकों की राय भी इस मामले में बटी हुई है। लेकिन अब एलियन की खोज के लिए एक और पहल की गई है। एलियन की खोज में आम आदमी को शामिल करने के लिए एक वेबसाइट को लॉंच किया गया है।

अमरीकी शहर लॉस एंजेल्स में टेड( टेक्नोलोजी, इंटरटेनमेंट और डिज़ाइन) कॉंफ़्रेंस के दौरान ये वेबसाइट लॉंच की गई है जिसका नाम है 'सेटीलाइव डॉट ओआरजी'। ये वेबसाइट सेटी(सर्च फॉर एक्सट्राटेरेस्ट्रियल इंटेलिजेंस) एलेन टेलिस्कोप के ज़रिए संचारित रेडियो तरंगों को सीधे प्रसारित करेगा। इसमें भाग लेने वालों को कहा जाएगा कि अगर उन्हें कोई भी असामान्य गतिविधि दिखे तो वे फ़ौरन इसकी जानकारी दें।

ऐसा माना जाता है कि इंसानों का दिमाग़ उन चीज़ो को भी देख सकता है जो कि शायद कोई स्वचालित मशीन नहीं देख सकता। इस वेबासाइट को लॉंच किए जाने का मुख्य उद्देश्य ये है कि धरती पर रहने वाले आम आदमी भी अगर चाहे तो ब्रह्माण्ड में अपने किसी एलियन साथी को खोज में शामिल हो सकता है।

जिलियन टार्टर

इस परियोजना की निदेशक हैं डॉक्टर जिलियन टार्टर जिन्हें 2009 में टेड एवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। डॉक्टर टार्टर ने अपना पूरा करियर एलियन की खोज में लगा दिया है। उनका मानना है कि इस वेबसाइट के लॉच होने से एलियन की खोज में जुटे वैज्ञानिकों और दूसरे विशेषज्ञों को एक साथ आने का मौक़ा मिलेगा। डॉक्टर टार्टर के अनुसार ढेर सारे कार्यकर्ता होने के कारण उन तरंगों का विश्लेषण करना आसान हो जाएगा जिन पर अब तक ध्यान नहीं जा पाता था।

पिछले कुछ वर्षो में सेटी इंस्टीच्यूट को चलाना एक बड़ी समस्या बन गई थी और ये लोगों के चंदों पर निर्भर रहता है। हालाकि इस परियोजना को आर्थिक मदद देने वालों में पूर्व अंतरिक्ष यात्री बिल एंडर्स, साइ-फ़ाई के लेखक लैरी निवेन और हॉलीवुड की हीरोइन जोडी फॉस्टर जैसे कुछ बड़े नाम भी शामिल है। इससे पहले भी कई दूसरे वैज्ञानिक परियोजनाओं में आम लोगों के शामिल होने से काफ़ी लाभ हुए हैं।

मिसाल के तौर पर 'ज़ूनीवर्स' परियोजना इंटरनेट का सबसे बड़ा और सफल वैज्ञानिक परियोजना है जिसमें आम लोग शामिल हैं। ज़ूनीवर्स भी इस नई पहल का समर्थन कर रहा है।
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नई पीढ़ी के सवालों के लिए तैयार हैं आप?


वह दस साल की बच्ची है। उसका नाम है ऐश्वर्या। हालांकि उसका ऐश्वर्या बच्चन से कोई लेना-देना नहीं है, जो एक जानी-मानी शख्सियत हैं। संभव है कि इस खूबसूरत अभिनेत्री ने 1990 के दशक में सौंदर्य स्पद्र्धा में सवालों के अच्छे ढंग से जवाब दिए हों और संभवत: जजों ने उनसे बेहतरीन सवाल भी पूछे हों। लेकिन इस दस वर्षीय ऐश्वर्या पाराशर ने जो सवाल पूछा है, उसने न सिर्फ जजों, आम भारतीयों, अग्रणी विशारदों बल्कि समूची सरकार को उलझन में डाल दिया है। उसका एक सवाल, जो उसके शहर लखनऊ के स्थानीय राइट टू इंफॉर्मेशन ऑफिसर के समक्ष पेश किया गया था, सीधा प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंचा। वहां से इसेगृह मंत्रालय भेजा गया और इसके बाद यह राष्टरीय अभिलेखागार (एनएआई) तक पहुंचा। देश के इतने बड़े-बड़े कार्यालयों में घूमने के बाद, पांचवीं कक्षा में पढऩे वाली इस बच्ची को जवाब में एनएआई के असिस्टेंट डायरेक्टर का पत्र मिला। इसमें कहा गया, 'आपने जो जानकारी मांगी है, उससे संबंधित कोई खास दस्तावेज हमारे पास नहीं हैं।' पत्र में उस बच्ची से यह भी कहा गया था कि यदि वह खुद एनएआई के ऑफिस में आकर इस संदर्भ में कोई खोजबीन करना चाहती है, तो उसका यहां स्वागत है। 

आखिर उसने ऐसा कौन-सा सवाल पूछा था, जिसने इतने सारे शीर्षस्थ अधिकारियों को उलझन में डाल दिया? उसने बस यही पूछा था कि महात्मा गांधी को क्या कभी आधिकारिक तौर पर 'राष्टï्रपिता' की उपाधि दी गई थी? उसने सबसे पहले यह सवाल लखनऊ के मोटेंसरी स्कूल के अपने टीचरों से पूछा, जहां वह पढ़ती है। जब टीचर प्रामाणिक ढंग से इसका कोई उपयुक्त जवाब नहीं दे सके, तो उसने अपनी मां (जो एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं) की सलाह पर सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत सरकार से इस संदर्भ में जानकारी मांगी। बहरहाल, यदि हम पिछले रिकॉर्ड पर नजर दौड़ाएं तो हमें पता चलेगा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सबसे पहले बापू को 'राष्टपिता' कहकर संबोधित किया और बाद में यह चलन बन गया। कुछ लोगों का कहना है कि सुभाष चंद्र बोस ने एक बार रंगून से रेडियो पर संबोधित करते हुए महात्मा गांधी को यह उपाधि दी। बहरहाल, इस पर अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग जवाब पेश किए हैं। 

वैसे ऐश्वर्या सवाल पूछने वाली इकलौती बच्ची नहीं है। हरेक बच्चा जिज्ञासु होता है और वह हमसे विभिन्न तरह के सवाल पूछता रहता है। लेकिन दुर्भाग्य से हममें से किसी के पास इतना समय नहीं होता कि उसके फौरी तौर पर पूछे गए इंटेलिजेंट सवालों को सुनकर उनके उपयुक्त जवाब दे सकें। हमारी अज्ञानता या अधीरता का नतीजा यह होता है कि हम एक औसत दर्जे की अगली पीढ़ी तैयार करने लगते हैं। यदि आपके बच्चे आपसे ऐसे सवाल पूछते हैं, जो आपको मुश्किल स्थिति में डाल देते हैं तो कृपया इसके लिए बच्चों को दोष न दें। इस पीढ़ी में बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे हैं जो अपनी कल्पनाशीलता का इस्तेमाल करते हुए बड़े गहरे सवाल पूछते हैं। हम सबने इस नई पीढ़ी में नादान विचारों वाले कई कई उग्र बच्चे देखे होंगे, लेकिन वे भी प्रबल भावनाएं और स्पष्टï राय जाहिर करते हैं। 

वे आपसे कई तरह के सवाल पूछ सकते हैं, मसलन- हवाई जहाज क्यों उड़ते हैं? मछलियां क्यों तैरती हैं? हम इंसान की तरह भगवान को क्यों नहीं देख सकते? किसी को मरता देख बच्चे पूछ सकते हैं कि इंसान मरते क्यों हैं। क्या आपके पास इन सवालों के जवाब हैं? 
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ईर्ष्या और जलन दोनों में आखिर अंतर क्या है ?

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