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Sunday, September 26, 2010

कम्प्यूटर नेटवर्किग है बेहद डिमांडिंग

गोपाल  को एक बार कारोबार के सिलसिले में अपने शहर से दूर सिंगापुर जाना पडा। एक दिन वहां के मशहूर बाजार में घूमते हुए उन्हें एक सामान पसंद आ गया। उस कीमती वस्तु को खरीदने के लिए उन्होंने अपना पर्स खोला, तो उसमें उतने पैसे नहीं थे। एकाएक उन्हें अपने क्रेडिट तथा डेबिट कार्ड याद आए। फिर चिंता किस बात की। उन्होंने एटीएम से पैसे निकाले और भुगतान कर दिया। दरअसल, यह कम्प्यूटर नेटवर्किंग का कमाल है। क्रेडिट-डेबिट कार्ड के अलावा नेट बैंकिंग, फोन बैंकिंग, रेल या एयर रिजर्वेशन आदि भी नेटवर्किग के ही उदाहरण हैं। एक कम्प्यूटर से दूसरे कम्प्यूटर, एक ऑफिस या एक शहर से दूसरे शहर या फिर एक देश से किसी अन्य देश में डाटा का ट्रांसफर भी नेटवर्किग का ही कमाल होता है।
क्या है नेटवर्किग?
नेटवर्किंग शब्द नेट यानी जाल से बना है, जिसका अर्थ है दो या दो से अधिक चीजों को आपस में जोडना। कम्प्यूटर के संदर्भ में नेटवर्किग का मतलब है दो या दो से अधिक कम्प्यूटरों को एक कंपनी, एक शहर, एक देश के विभिन्न स्थानों को आपस में जोडना व उनके संस्थानों को एक्सेस करना तथा विश्व के किसी भी कोने में स्थित कंप्यूटरों को आपस में जोडना। इंटरनेट मोबाइल कम्युनिकेशन, सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्किंग का ही नतीजा है। कम्प्यूटर नेटवर्किंग को निम्न भागों में बांटा जा सकता है :
लोकल एरिया नेटवर्किंग (लैन) : इस तरह की नेटवर्किंग को लैन के नाम से जाना जाता है। इस तरह की नेटवर्किंग की मदद से किसी एक इमारत में रखे कम्प्यूटरों को आपस में जोडा जाता है। इसके तहत जोडे जाने वाले कम्प्यूटरों के बीच की दूरी 100 मीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। इसका कारण यह है कि इस तरह की नेटवर्किंग में कंप्यूटरों को केबल द्वारा एक-दूसरे से जोडा जाता है। ज्यादा दूरी होने पर डाटा के लॉस हो जाने की आशंका रहती है।
मेट्रोपोलिटन एरिया नेटवर्किंग (मैन) : इसमें वायरलेस तथा वायर दोनों तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह की नेटवर्किग में एक शहर के अलग-अलग इलाकों में स्थित विभिन्न इमारतों या कंपनियों में रखे कम्प्यूटरों को आपस में जोडा जाता है। इसमें सामान्यत: ऑप्टिकल केबल, फाइबर केबल, राउटर, स्विच, रिपीटर इत्यादि एडवांस इस्ट्रूमेंट का उपयोग किया जाता है।
वाइड एरिया नेटवर्क (वैन) : वाइड एरिया नेटवर्क के तहत अलग-अलग शहरों या देशों में कार्यरत कम्प्यूटरों को जोडा जाता है। इसमें भौगोलिक दूरी कोई मायने नहीं रखती, क्योंकि यह पूर्णतया वायरलेस टेक्नोलॉजी पर आधारित होता है। इसमें कम्प्यूटरों को सैटेलाइट, राउटर, आईएसडीएन स्विच, वैन लाइनस, (ISDN, X-25, ATM, Frame Relay etc.) द्वारा आपस में जोडा जाता है।
स्टोरेज एरिया नेटवर्क (सैन) : इस तरह की नेटवर्किंग का उपयोग प्राय: बडी कंपनियों तथा इंटरनेट सर्विसेस प्रदान करने वाली कंपनियों द्वारा किया जाता है। इसके तहत एक सर्वर तथा स्टोरेज डिवाइसों को अनेक सर्वरों और स्टोरेज डिवाइसों के साथ सीधे जोडा जाता है।
नेटवर्किंग से लाभ
आईटी रिवॉल्यूशन के इस दौर में नेटवर्किग बेहद जरूरी है। बीपीओ कंपनियों का सारा काम-काज नेटवर्किग पर निर्भर होता है। कम्प्यूटर नेटवर्किंग के लाभों को मुख्यत: दो भागों में बांटा जा सकता है :
1. रिसोर्स शेयरिंग : इसकी सहायता से उपकरणों तथा सर्विसेस के उपयोग को कम करके किसी एक या दो कम्प्यूटर के साथ जोड दिया जाता है। इससे हर कम्प्यूटर के लिए अलग-अलग उपकरणों की आवश्यकता नहीं होती है और कंपनियों की खर्चो में काफी बचत होती है। 2. इन्फॉर्मेशन शेयरिंग : इसकी मदद से किसी एक कम्प्यूटर और उसके डाटा को दुनिया के दूसरे कोने में रखे कम्प्यूटर में सहजता से आदान-प्रदान किया जा सकता है। इतना ही नहीं, इसकी मदद से हम वॉयस (बोलती हुई) फोटो, लाइव टेलिकॉस्ट आदि भी शेयर कर सकते हैं।
कौन-सा करें कोर्स
नेटवर्किंग के कोर्स मुख्यत: दो तरह के होते हैं-नेशनल और इंटरनेशनल। इंटरनेशनल कोर्स के तहत वे कोर्स आते हैं, जिनकी परीक्षा तथा सर्टिफिकेट इंटरनेशनल संस्थानों द्वारा लिए जाते हैं। इनकी विश्व में हर जगह मांग होती है। इंटरनेशनल कोर्सो में प्रमुख हैं : एमसीएसई यानी माइक्रोसॉफ्ट सर्टिफाइड सिस्टम इंजीनियर, एमसीएसए यानी माइक्रोसॉफ्ट सर्टिफाइड सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर, सीसीएनए यानी सिस्को सर्टिफाइड नेटवर्क असोसिएट, आरएचसीई यानी, रेडहैड सर्टिफाइड इंजीनियर काम्पटिया ए+, काम्पटिया एन+, काम्पटिया सिक्योरिटी +, काम्पटिया सर्वर+ आदि। इसके अलावा, नेशनल कोर्सो में प्रमुख के नाम इस प्रकार हैं :
1. डिप्लोमा इन नेटवर्क टेक्नोलॉजी
2. डिप्लोमा इन नेटवर्क टेक्नोलॉजी ऐंड डाटाबेस एडमिनिस्ट्रेशन
3. एडवांस डिप्लोमा इन नेटवर्क टेक्नोलॉजी ऐंड सिक्योरिटी एक्सपर्ट
4. मास्टर इन नेटवर्क इंजीनियरिंग
प्रवेश के लिए योग्यता
कम्प्यूटर नेटवर्किग से संबंधित अधिकांश कोर्सो में प्रवेश के लिए बारहवीं उत्तीर्ण होना अनिवार्य है। हालांकि, इन कोर्सो को ग्रेजुएट या ऊंची शिक्षा प्राप्त स्टूडेंट भी कर सकते हैं। यदि अंग्रेजी भाषा की अच्छी जानकारी इस क्षेत्र के लिए अतिरिक्त योग्यता होगी।
संभावनाएं व सैलॅरी पैकेज
आज भारत सहित पूरे विश्व में जिस तरह से कम्प्यूटरों का प्रयोग तेजी से बढ रहा है तथा पूरे विश्व का जिस तरह से आधुनिकीकरण हो रहा है, उसको देखते हुए कहा जा सकता है कि नेटवर्किंग इंजीनियरिंग में अपार संभावनाएं हैं। ऐसी स्थिति में आने वाले दशक में अकेले भारत में ही लाखों स्किल्ड लोगों की जरूरत होगी। एक स्किल्ड नेटवर्किंग इंजीनियर किसी भी छोटी या बडी कंपनी में निम्न पदों पर कार्य कर सकता है : नेटवर्क इंजीनियर, नेटवर्क सिक्योरिटी एक्सपर्ट, नेटवर्क एडमिनिस्ट्रेटर, डेस्कटॉप सपोर्ट इंजीनियर, टीम लीडर टेक्निकल हेड, टेक्निकल सपोर्ट इंजीनियर, सिस्टम एनालाइजर आदि। इन पदों पर 20 हजार रुपये से लेकर एक लाख रुपये तक आसानी से कमा सकते हैं। योग्यता और अनुभव के आधार पर कोई नेटवर्किंग इंजीनियर प्रोग्रेस करते हुए सीनियर सिस्टम मैनेजर या इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी मैनेजर भी बन सकता है।
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आईटी की बहार हैं संभावनाएं अपार

ताजा अध्ययन के मुताबिक भारत का इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी सेक्टर इस समय प्रति वर्ष करीब 25 प्रतिशत की दर से आगे बढ रहा है। स्टडी के अनुसार आईटी सेक्टर के विकास की यह रफ्तार अगले पांच साल तक इसी तरह बनी रहेगी। इस विकास का प्रमुख कारण देश की आर्थिक तरक्की है, जिसकी वजह से विश्वव्यापी मंदी (खासकर अमेरिका में) के बावजूद भारत आईटी और बीपीओ (बिजनेस प्रॉसेस आउटसोर्सिग) के क्षेत्र में ग्लोबल लीडर बना हुआ है। हालांकि, रुपये के मुकाबले डॉलर के लगातार गिरते मूल्य के कारण इंडियन बीपीओ कंपनियों के मुनाफे में काफी गिरावट जरूर आई है, लेकिन इसके बावजूद उनके बिजनेस में लगातार इजाफा हो ही रहा है। इन सबके कारण आउटसोर्सिग से वर्ष 2010 तक देश को करीब 60 करोड डॉलर की आमदनी होने की उम्मीद है।
डिमांड ज्यादा, सप्लाई कम
आईटी सेक्टर में भारत के वर्चस्व को दुनिया में बनाए रखने के लिए सबसे बडा चैलेंज है-स्किल्ड मैनपॉवर की कमी को पूरा करना। देश के आईटी सेक्टर के सामने सबसे बडी समस्या पर्याप्त संख्या में एक्सपर्ट्स उपलब्ध न होना है। इस बारे में देश की सबसे बडी आईटी सर्विस प्रोवाइडर कंपनी टीसीएस (टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज) के सीईओ एस रामादुरई इस बात को स्वीकार करते हैं कि इस क्षेत्र में प्रशिक्षित लोगों की डिमांड बहुत ज्यादा है, जबकि सप्लाई बहुत कम। जानी-मानी सर्वे कंपनी मैकिन्जे के प्रमुख नौशिर काका आंकडों के आधार पर बताते हैं कि वर्तमान गति से चल रहे कारोबार को देखते हुए भारत को वर्ष 2010 तक 2.3 मिलियन (करीब 23 लाख) आईटी व बीपीओ एक्सपर्ट्स की जरूरत होगी, लेकिन देश में जिस रफ्तार से क्वॉलिफाइड लोग तैयार हो रहे हैं, उसमें 5 लाख की कमी बनी रहेगी। इस स्थिति को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि यदि युवा अपनी रुचि के अनुसार सॉफ्टवेयर या हार्डवेयर-नेटवर्किग से जुडा कोई भी कोर्स करते हैं, तो उनके लिए आकर्षक रोजगार का द्वार हमेशा खुला है और वह भी आकर्षक सैलॅरी पैकेज पर।
तरह-तरह के हैं काम
आईटी वर्ल्ड में तरह-तरह के काम हैं। खास बात यह है कि इन सभी कामों में खूब पैसा भी मिल रहा है। यही कारण है कि युवाओं के बीच इनसे संबंधित कोर्सो का जबर्दस्त क्रेज है और जिन संस्थानों में ऐसे कोर्स संचालित हैं, वहां स्टूडेंट्स की भीड लगी है। आइए जानते हैं किन-किन क्षेत्रों में स्किल्ड मैनपॉवर की जरूरत है :
सॉफ्टवेयर डेवलॅपमेंट : आईटी सेक्टर में सॉफ्टवेयर डेवलॅपमेंट के कार्य से सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स और प्रोग्रामर्स जुडे होते हैं। इनका मुख्य कार्य विभिन्न सॉफ्टवेयर लैंग्वेज में सॉफ्टवेयर डेवॅलप करना होता है। देखा जाए, तो सॉफ्टवेयर दो तरह के होते हैं-ऐप्लिकेशन सॉफ्टवेयर और सिस्टम सॉफ्टवेयर। इन सॉफ्टवेयर की सहायता से कई तरह के प्रोग्रामिंग लैंग्वेज तैयार किए जाते हैं, जिनका इस्तेमाल कंपनियां करती हैं। सॉफ्टवेयर डेवलॅपमेंट में काम करने के लिए नॉलेज को हमेशा अपडेट करते रहने के साथ ही प्रमुख प्रोग्रामिंग लैंग्वेजेज, जैसे- सी, सी++, जावा, विजुअल बेसिक आदि में विशेषज्ञता हासिल करनी होगी।
सिस्टम एनैलिस्ट : सिस्टम एनैलिस्ट कम्प्यूटर डेवलॅप करने का प्लॉन बनाते हैं। यदि सिस्टम एनैलिस्ट के रूप में करियर बनाना चाहते हैं, तो आपको सभी तरह के सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर की जानकारी रखनी होगी। सिस्टम एनैलिस्ट ग्राहकों की बिजनेस आवश्यकता को समझते हुए भी सिस्टम तैयार करने में दक्ष होते हैं।
डाटा बेस : डाटा बेस के तहत डाटा को इस प्रकार से स्टोर किया जाता है कि जरूरत पडने पर इन्हें आसानी से इस्तेमाल और अपटेड किया जा सके। किसी भी कंपनी के लिए उनका डाटा काफी मायने रखता है। ऐसे में डाटाबेस प्रोफेशनल्स की मांग तेजी से बढने लगी है, क्योंकि आज तकरीबन हर छोटी-बडी कंपनी डाटा मेंटेन करने और उन्हें अपटेड रखने की कोशिश करती रहती है।
सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर : सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर का मुख्य होता है। कार्य कनेक्टिविटी और इंटरनेट की सुविधा प्रदान करना। आईटी सेक्टर में नेटवर्किग काफी महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि नेटवर्किग के माध्यम से ही कम्प्यूटर एक दूसरे से जुडे होते हैं। देखा जाए, तो आज हर छोटे-बडे संस्थान में कम्प्यूटर नेटवर्किग के लिए सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर की जरूरत होती है। हालांकि, इस क्षेत्र में कार्य करने वालों को सिस्टम सिक्योरिटी के साथ-साथ नेटवर्किग सिक्योरिटी का भी ध्यान रखना पडता है। इसके अलावा, आप इस सेक्टर में कैड स्पेशलिस्ट, सिस्टम आर्किटेक्ट, विजुअल डिजाइनर, एचटीएमएल प्रोग्रामर, डोमेन स्पेशलिस्ट, इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी एक्सपर्ट, इंटिग्रेशन स्पेशलिस्ट, कम्युनिकेशन इंजीनियर, सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर, सेमीकंडक्टर स्पेशलिस्ट आदि के रूप में काम कर सकते हैं।
हार्डवेयर : सॉफ्टवेयर की तरह हार्डवेयर भी आईटी सेक्टर का महत्वपूर्ण अंग है। हार्डवेयर इंजीनियर के रूप में काम करने वालों पर कम्प्यूटर असेंबल करने से लेकर इसके खराब पा‌र्ट्स की मरम्मत तक की पूरी जिम्मेदारी होती है। दरअसल, आज हर जगह कम्प्यूटर के बढते इस्तेमाल के कारण ऐसे हार्डवेयर प्रोफेशनल्स की मांग काफी बढ गई है, जो कि कम्प्यूटर को चुस्त-दुरुस्त रखने में माहिर हों। हार्डवेयर के क्षेत्र से जुडने के बाद मैन्युफैक्चरिंग, रिसर्च ऐंड डेवलॅपमेंट आदि क्षेत्र में भी कार्य करने के भरपूर मौके मिलते हैं।
कोर्स हैं कई
कम्प्यूटर के क्षेत्र में दो तरह के काम होते हैं-पहला, सॉफ्टवेयर से संबंधित और दूसरा, हार्डवेयर से संबंधित। सॉफ्टवेयर के तहत जहां प्रोग्रामिंग और सॉफ्टवेयर डेवलॅपमेंट की ट्रेनिंग दी जाती है, वहीं हार्डवेयर के तहत कम्प्यूटर को असेंबल करने तथा किसी पार्ट के खराब होने पर उसे ठीक करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। इनसे संबंधित कई तरह के कोर्स सरकारी और निजी संस्थाओं द्वारा चलाए जाते हैं। इनमें प्रमुख हैं :
ग्रेजुएट लेवॅल कोर्स : इसके लेवॅल पर प्रमुख कोर्स हैं-बीएससी नॉलेज को हमेशा अपडेट करते रहने के साथ ही प्रमुख प्रोग्रामिंग लैंग्वेजेज, जैसे- सी, सी++, जावा, विजुअल बेसिक आदि में विशेषज्ञता हासिल करनी होगी।
सिस्टम एनैलिस्ट : सिस्टम एनैलिस्ट कम्प्यूटर डेवलॅप करने का प्लॉन बनाते हैं। यदि सिस्टम एनैलिस्ट के रूप में करियर बनाना चाहते हैं, तो आपको सभी तरह के सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर की जानकारी रखनी होगी। सिस्टम एनैलिस्ट ग्राहकों की बिजनेस आवश्यकता को समझते हुए भी सिस्टम तैयार करने में दक्ष होते हैं।
सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर : आईटी सेक्टर में नेटवर्किग काफी महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि नेटवर्किग के माध्यम से ही कम्प्यूटर एक दूसरे से जुडे होते हैं। देखा जाए, तो आज हर छोटे-बडे संस्थान में कम्प्यूटर नेटवर्किग के लिए सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर की जरूरत होती है। हालांकि, इस क्षेत्र में कार्य करने वालों को सिस्टम सिक्योरिटी के साथ-साथ नेटवर्किग सिक्योरिटी का भी ध्यान रखना पडता है। इसके अलावा, आप इस सेक्टर में कैड स्पेशलिस्ट, सिस्टम आर्किटेक्ट, विजुअल डिजाइनर, एचटीएमएल प्रोग्रामर, डोमेन स्पेशलिस्ट, इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी एक्सपर्ट, इंटिग्रेशन स्पेशलिस्ट, कम्युनिकेशन इंजीनियर, सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर, सेमीकंडक्टर स्पेशलिस्ट आदि के रूप में काम कर सकते हैं।
हार्डवेयर सॉफ्टवेयर की तरह हार्डवेयर भी आईटी सेक्टर का महत्वपूर्ण अंग है। हार्डवेयर इंजीनियर के रूप में काम करने वालों पर कम्प्यूटर असेंबल करने से लेकर इसके खराब पार्ट्स की मरम्मत तक की पूरी जिम्मेदारी होती है। आज हर जगह कम्प्यूटर के बढते इस्तेमाल के कारण ऐसे हार्डवेयर प्रोफेशनल्स की मांग काफी बढ गई है, जो कि कम्प्यूटर को चुस्त-दुरुस्त रखने में माहिर हों। हार्डवेयर के क्षेत्र से जुडने के बाद मैन्युफैक्चरिंग, रिसर्च ऐंड डेवलॅपमेंट आदि क्षेत्र में भी कार्य करने के भरपूर मौके मिलते हैं।
कोर्स हैं कई
कम्प्यूटर के क्षेत्र में दो तरह के काम होते हैं-पहला, सॉफ्टवेयर से संबंधित और दूसरा, हार्डवेयर से संबंधित। सॉफ्टवेयर के तहत जहां प्रोग्रामिंग और सॉफ्टवेयर डेवलॅपमेंट की ट्रेनिंग दी जाती है, वहीं हार्डवेयर के तहत कम्प्यूटर को असेंबल करने तथा किसी पार्ट के खराब होने पर उसे ठीक करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। इनसे संबंधित कई तरह के कोर्स सरकारी और निजी संस्थाओं द्वारा चलाए जाते हैं। इनमें प्रमुख हैं :
ग्रेजुएट लेवॅल कोर्स : इसके लेवॅल पर प्रमुख कोर्स हैं-बीएससी इन कम्प्यूटर साइंस और बैचलर ऑफ कम्प्यूटर ऐप्लिकेशन यानी बीसीए। यह तीन साल का फुलटाइम कोर्स है। इसके अलावा आजकल सबसे ज्यादा क्रेज बीटेक (इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी या कम्यूटर साइंस) का है। यह कोर्स देश के सभी आईआईटी और इंजीनियरिंग कॉलेजों में है। आईआईटी में एडमिशन के लिए आईआईटी-जेईई उत्तीर्ण करनी होती है, जबकि अन्य इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश के लिए एआईईईई क्वालिफाई करना होता है। इन एंट्रेंस में शामिल होने के लिए फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथमेटिक्स के साथ बारहवीं उत्तीर्ण होना चाहिए। इसके तहत कम्प्यूटर के बेसिक्स के साथ विभिन्न सॉफ्टवेयर लैंग्वेजेज की जानकारी और सॉफ्टवेयर डेवलॅप करना सिखाया जाता है। पोस्ट-ग्रेजुएट कोर्स : मास्टर ऑफ कम्प्यूटर ऐप्लिकेशन यानी एमसीए तीन वर्ष का फुलटाइम पोस्ट-ग्रेजुएट कोर्स है। यह कोर्स करके स्टूडेंट्स सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हो सकते हैं। इसके तहत कम्प्यूटर संबंधी अवधारणाओं और इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी की ठोस जानकारी दी जाती है। एमसीए प्रोग्राम में सी, सी++, जावा लैंग्वेज, टेक्निकल टॉपिक्स, जैसे-कम्प्यूटर डिजाइन, थ्योरी ऑफ कम्प्यूटिंग, डिस्क्रिट मैथमेटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ग्राफिक्स, एनिमेशन आदि भी पढाया जाता है। बीसीए या एमसीए वहीं से करना चाहिए, जहां इन कोर्सो को ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (एआईसीटीई) से मान्यता प्राप्त हो।
अन्य सॉफ्टवेयर कोर्स : उपर्युक्त कोर्सो के अलावा, मास्टर ऑफ कम्प्यूटर साइंस (एमसीएस), मास्टर ऑफ साइंस (कम्प्यूटर साइंस, इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग आदि) तथा कम्प्यूटर साइंस या इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी में एमफिल और पीएचडी भी किया जा सकता है।
हार्डवेयर-नेटवर्किग कोर्स : हर छोटे-बडे ऑफिस में कम्प्यूटर की अनिवार्यता को देखते हुए हार्डवेयर-नेटवर्किग एक्सपर्ट की डिमांड पूरी दुनिया में तेजी से बढ रही है। हार्डवेयर-नेटवर्किग कोर्स सामान्यतया निजी क्षेत्र के संस्थानों द्वारा चलाया जा रहा है। इस तरह के कोर्सो में कम्प्यूटर रिपेयर करने, असेंबल करने तथा खराब पुर्जो को बदलने की ट्रेनिंग दी जाती है। ऐसे कोर्स की अवधि सोलह से अठारह माह की होती है। इससे संबंधित कोर्स में प्रवेश लेने से पहले इस बात का खास खयाल रखें कि उस संस्थान में चिप लेवॅल की ट्रेनिंग दी जाती है या नहीं! यह एडवांस टेक्निक है। पहले कार्ड लेवॅल की ट्रेनिंग दी जाती थी, जो अब आउटडेटेड हो गई है। कार्ड लेवॅल में कम्प्यूटर के किसी पार्ट में खराबी आने पर पूरे खराब पार्ट को ही बदल दिया जाता था। पर अब चिप लेवॅल का प्रचलन है। इसमें कम्प्यूटर के जिस चिप में खराबी आती है, केवल उसकी मरम्मत करना सिखाया जाता है। इस बारे में दिल्ली स्थित ए-सेट के डायरेक्टर उदय कुमार वैश्य कहते हैं कि हार्डवेयर-नेटवर्किग के सीधे तौर पर जॉब ओरिएंटेड कोर्स होने के कारण स्टूडेंट्स को इससे संबंधित किसी भी संस्थान में प्रवेश के लिए खास सावधानी बरतनी चाहिए। प्रवेश वहीं लें, जहां चिप लेवॅल का एडवांस कोर्स कराया जाता हो और सैन जैसी उन्नत तकनीक का इस्तेमाल किया जाता हो। इसके अलावा पूरे कोर्स की एकमुश्त फीस न लेकर मासिक आधार पर ली जाती हो, ताकि पढाई से संतुष्ट न होने पर आप वह संस्थान छोडकर कहीं और एडमिशन ले सकें।
डोएक कोर्स : भारत सरकार के इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी मिनिस्ट्री के अंतर्गत कार्यरत स्वायत्त संस्था डोएक (डीओईएसीसी) द्वारा संचालित विभिन्न लेवॅल के कोर्स करके भी आईटी की दुनिया में स्थान बना सकते हैं। बीसीए या एमसीए जैसे कोर्सो में प्रवेश न पा सकने वाले स्टूडेंट इन कोर्सो में प्रवेश ले सकते हैं। देश भर में डोएक से संबद्ध करीब एक हजार से अधिक संस्थानों द्वारा कोर्स संचालित किए जाते हैं। ये कोर्स चार स्तरों पर संचालित होते हैं-ओ लेवॅल, ए लेवॅल, बी लेवॅल तथा सी लेवॅल। इनमें ओ लेवॅल को पॉलिटेक्निक या डिप्लोमा के समकक्ष माना जाता है। ए लेवॅल एडवांस डिप्लोमा या पीजी डिप्लोमा तथा बी लेवॅल को एमसीए या एमएससी के समकक्ष माना जाता है। सी लेवॅल सबसे उच्च श्रेणी का कोर्स है, जिसे एमटेक के बराबर मान्यता प्राप्त है। डोएक सोसायटी के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर पीएन गुप्ता का कहना है कि डोएक की डिग्रियों को भारत सरकार ने सभी तरह की नौकरियों के लिए मान्यता प्रदान की है।
वर्ष 2010 तक भारत में करीब 23 लाख आईटी एक्सपर्ट्स की जरूरत होगी।
वैश्रि्वक मंदी के बावजूद भारतीय आईटी इंडस्ट्री की सालाना ग्रोथ रेट 25 प्रतिशत है।
आईटी इंडस्ट्री को आउटसोर्सिग से वर्ष 2010 तक 60 करोड डॉलर की आमदनी होगी।
आईआईटी या इंजीनियरिंग कॉलेजों से बीटेक करके आईटी वर्ल्ड में पहचान बना सकते हैं।
हार्डवेयर-नेटवर्किग का कोर्स करके भी बडी व मल्टीनेशनल कंपनियों में जॉब पा सकते हैं।
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नेटवर्किग-हार्डवेयर में हैं खूब अवसर

इन दिनों अधिकांश स्टूडेंट अपने मनपसंद कोर्सो में एडमिशन की जद्दो जहद में लगे होंगे। लेकिन ऐसे भी तमाम स्टूडेट हैं, जो किसी कारण बारहवीं के बाद आगे की रेगुलर पढाई करने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे युवा कोई ऐसा प्रोफेशनल कोर्स करना चाहते हैं, जिसे पूरा करने के बाद उन्हें ठीक-ठाक नौकरी मिल जाए। आज के आईटी एज में ऐसे कई कोर्स उपलब्ध हैं। ऐसे कोर्सो में प्रमुख है-कम्प्यूटर आधारित हार्डवेयर एवं नेटवर्किग का कोर्स। कम्प्यूटर आधारित काम-काज के बढने से हार्डवेयर इंजीनियरों की खूब मांग है।
क्या है हार्डवेयर-नेटवर्किग?
कम्प्यूटर की दुनिया में मुख्य रूप से दो तरह का काम होता है-पहला सॉफ्टवेयर का, जिसकी मदद से कम्प्यूटर काम करता है और दूसरा, हार्डवेयर का, जो कम्प्यूटर की मशीनरी होता है। इसमें मुख्य रूप से सीपीयू यानी हार्ड डिस्क, मदर बोर्ड, मॉनीटर, माउस आदि होते हैं, जिनकी मदद से कम्प्यूटर को ऑपरेट किया जाता है। नेटवर्किग के तहत एक जगह के कम्प्यूटर को उसी जगह या किसी अन्य शहर या देश में स्थित कम्प्यूटरों से जोडा जाता है, ताकि उनके डाटा आपस में शेयर किए जा सकें। नेटवर्किग का काम मुख्यत: तीन तरह से किया जाता है-लैन यानी लोकल एरिया नेटवर्क, सैन यानी मेट्रोपॉलिटन एरिया नेटवर्क और वैन यानी वाइड एरिया नेटवर्क के माध्यम से। पूरी दुनिया में सॉफ्टवेयर डेवलॅपमेंट के लिए भारत का नाम है। ऐसी तमाम कंपनियां हैं, जिन्होंने ग्लोबल लेवॅल पर पहचान बनाई है। इनमें टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो, सत्यम, एचसीएल आदि प्रमुख हैं।
संस्थान कैसा हो?
कहीं भी एडमिशन लेते समय इस बात का ध्यान जरूर रखें कि वहां लेटेस्ट तकनीक से ट्रेनिंग दी जा रही है या नहीं। इसके अलावा यह भी देखें कि वहां लैन, वैन के साथ-साथ MCSE  CCNA जैसी अत्याधुनिक ट्रेनिंग की सुविधा है या नहीं, मार्केट में अब MCSE CCNA  की  जानकारों की ही डिमांड है। हार्डवेयर की ट्रेनिंग दो तरह की होती है-कार्ड लेवॅल की और चिप लेवॅल की। कार्ड लेवॅल में जहां कम्प्यूटर के खराब पार्ट को ही बदल दिया जाता है, वहीं अपडेटेड चिप लेवॅल में उस पार्ट की खराबी दूर की जाती है। ऐसे में चिप लेवॅल का कोर्स करना ही बेहतर होगा। ऐसा कोर्स करीब डेढ वर्ष की अवधि का है।
जरूरी योग्यता
हार्डवेयर-नेटवर्किग के कोर्स में एडमिशन के लिए कम से कम बारहवीं उत्तीर्ण होना चाहिए। साइंस बैकग्राउंड और कम्प्यूटर की बेसिक नॉलेज रखने वाले छात्रों को थोडा सुविधा होती है, हालांकि आ‌र्ट्स स्ट्रीम के छात्र भी यह कोर्स आसानी से कर सकते हैं।
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Wednesday, September 22, 2010

ऐसे लोग हमेशा दुखी ही रहते हैं जो...

एक आदमी रोज- रोज मंदिर जाता और प्रार्थना करता है,  हे भगवान मैं जीवन से बहुत परेशान हूं मुझे दुखों से मुक्ति दे दो। मुझे मोक्ष चाहिये, मुझे मोक्ष दिला दो। एक दिन भगवान परेशान हो गए क्योंकि वह रोज सुबह-सुबह पहुंच जाता और गिड़गिड़ता कि मैं दुखी हूं।

एक दिन भगवान प्रकट हो गए और बोले तुझे मुक्ती चाहिए तो लो इसी वक्त लो, यह खड़ा है विमान बैठकर चलो। वह आदमी घबरा कर बोला अभी, एकदम कैसे हो सकता है? अभी मेरा लड़का छोटा है। जरा जवान हो जाए उसकी शादी हो जाए फिर चलूंगा। भगवान ने कहा फिर तू मुझे रोज-रोज परेशान क्यों करता है। सुबह से रोज चिल्लाना शुरू कर देता है।

अगर मोक्ष नहीं चाहिए तो क्यों मुझे व्यर्थ ही परेशान करता है। वह व्यक्ति बोला भगवान किसने कहा मुझे मोक्ष नहीं चाहिए लेकिन अभी नहीं आप मुझे आश्वासन दे दें। अब उस व्यक्ति का बेटा जवान हो गया और उसकी शादी हो गई। भगवान फिर प्रकट हुए और बोले चलो मेरे साथ मे तुम्हें मोक्ष के लिए लेने आया हूं। लड़के की तो अभी शादी हुई है।

कम से कम एक बच्चा हो जाए, पोते या पोती का सुख देख लूं, फिर मैं बिल्कुल तैयार हूं। भगवान फिर वापस चले गए। ऐसे करते-करते वह व्यक्ति बूढ़ा हो गया उसके हाथ पैर थक गए। अभी तक जब भी भगवान आते वह उन्हें हर बार बहाना बना कर लौटा देता। अब वह व्यक्ति बूढ़ा हो गया तो भगवान को लगा कि अब तो मुझे इसकी मनोकामना पूरी कर ही देनी चाहिये। भगवान फिर प्रकट हो गए तो अब वह आदमी झुंझला गया और बोला आप तो मेरे पीछे ही पड़ गए आपको और कोई नहीं मिलता क्या?

आप कृपया यहां से चले जाइए। भगवान बोले फिर तू मुझसे इतने सालों से क्यों रोज मुक्ति मांगता है। दरअसल वो तो मेरी पुरानी आदत है। वो तो मैं आदतन बोलता हूं। कल मैं फिर आऊंगा और वही प्रार्थना दोहराऊंगा प्रकट मत हो जाना। अक्सर लोगों के साथ आज यही समस्या है वे समझते हैं, धर्म की यही तस्वीर है। मंदिर जाते हुए उम्र कट जाती है लेकिन परमात्मा के अनुरूप नहीं हो पाता क्योंकि वह भगवान को भी अपने हिसाब से चलाना चाहते हैं।

अपनी शर्तों पर पूजते हैं। उनकी पूजा का लक्ष्य भगवान को पाना नहीं बल्कि सांसारिक पदार्थों और दुखों से बचना भर है। इसलिए ऐसे लोग मांगने पर ही अपना सारा जीवन बीता देते हैं जो होता है उसका आनंद नहीं उठाते हैं। इसलिए ऐसे लोगों की जिन्दगी का अभाव कभी खत्म ही नहीं हो पाता है। वे हमेशा दुखी ही रहते है, खुद भगवान प्रकट हो जाएं तब भी।
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सफलता के लिए चाहिए सच्ची लगन

उन्नीसवीं सदी की घटना है। एक बार बंगाल में भीषण अकाल और महामारी का कहर टूट पड़ा। लोग दाने-दाने को तरसने लगे। चारों ओर हाहाकार मच गया।
ऐसी विकट स्थिति में एक दिन बाजार में एक असहाय बालक एक व्यक्ति से पैसे मांगने लगा-बाबूजी दो पैसे दे दो, बहुत भूखा हूं। उस व्यक्ति ने पूछा- यदि में तुम्हें चार पैसे दूं, तो क्या करोगे? बालक ने जवाब दिया-दो पैसे की खाने की सामग्री लूंगा और दो पैसे मां को दूंगा।
व्यक्ति ने फिर प्रश्न किया-अगर मैं तुम्हें दो आने दूं तो? अब बालक को लगा कि यह व्यक्ति उसका उपहास कर रहा है और वह चलने को हुआ। तब उस व्यक्ति ने बालक का हाथ पकड़ लिया और आत्मीयता से बोला- बताओ दो आने का क्या करोगे? बालके की आंखों में आंसू आ गए। वह बोला-एक आने का चावल लूंगा और शेष मां को दूंगा। मां की प्राणरक्षा हो जाएगी। तब उस व्यक्ति ने बालक को एक रुपया दिया। बालक प्रफुल्लित हो कर चला गया।
वही व्यक्ति कुछ वर्षों बाद एक दुकान के सामने से गुजर रहा था। दुकान पर बैठे युवक की दृष्टि जैसे ही उस व्यक्ति पर पड़ी, वह दौड़कर आया और उसके चरण छूकर विनम्रता के साथ उसे अपनी दुकान पर ले गया। युवक  ने अपना परिचय देते हुए कहा-श्रीमान। मैं वही बालक हूं, जिसे आपने अकाल की विभीषिका में दो पैसे मांगने पर एक रुपया दिया था। उसी एक रुपए से मैं यह दुकान खड़ी कर पाया हूं। व्यक्ति ने युवक को सीने से लगाते हुए कहा-बेटे। यह सफलता तुम्हें मेरे एक रुपए के कारण नहीं बल्कि तुम्हारी लगन व परिश्रम के मिली है। वह युवक विद्वत्ता की प्रतिमूर्ति ईश्वरचंद्र विद्यासागर थे, जिनके जीवन की यह घटना संदेश देती है कि लगन और मेहनत के बल पर कठिनतम लक्ष्यों की प्राप्ति भी की जा सकती है और सफलता की नई ईबारत लिखी जा सकती है।
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सफलता के लिए इन बातों का ध्यान रखें

सफलता के लिए इन बातों का ध्यान रखें

Source: पं. विजयशंकर मेहता 
कम्प्यूटर के दौर में हर चीज के शार्टकट ने हमारे दिमाग में घर कर लिया है। बिना शार्टकट अब शायद ही कोई काम होता हो। जीवन के प्रति इस रवैए ने हमारे समाज में भ्रष्टाचार के बीज बो दिए हैं। किसी काम में अगर भ्रष्टाचार शामिल हो जाए तो सफलता दूषित हो जाती है। और ऐसी सफलता आनंद नहीं, अशांति ही देती है।


यह तत्काल का समय है। सभी को सबकुछ जल्दी चाहिए। इस चक्कर में कुछ लोग शार्टकट अपना लेते हैं। सफलता के मामले में शार्टकट कभी-कभी भ्रष्टाचार और अपराध की सुरंग से भी गुजार देता है। हनुमानजी सफलता का पर्याय हैं। इनके यशगान हनुमानचालीसा में प्रथम पंक्तियों में गुरु की शरण की बात लिखी गई है। इस शरणागति का मतलब है मेरे पूर्ण पुरुषार्थ के बाद भी कोई शक्ति है जो मुझे असफलता से बचाएगी। इस शरणागति को मजबूत बनाने के लिए ही तुलसीदासजी ने हनुमानचालीसा के पहले दोहे में च्च्जो दायकु फलचारिज्ज् लिखा है।


यूं तो किसी भी ग्रंथ की फलश्रुति अंत में बताई जाती है पर यहाँ पहले ही लिख देने का कारण यही है कि सब लोग आज तुरंत फल चाहते हैं। ये चार फल हैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।आज के समय में शीघ्र फल की आकांक्षा हो यह तो ठीक है लेकिन शीघ्र फल दे ऐसा परिश्रम भी किया जाए। यदि हमारे ऊपर कोई दायित्व हो तो शतप्रतिशत परिणाम के लिए प्रयास किए जाएं। यदि विवेक से काम लिया जाए तो शीघ्रता का अर्थ है आलस्य रहित सक्रियता। अकारण विलंब करना हमारी आदत न बन जाए, इसलिए हनुमानजी से हम सीख लें तत्काल का अर्थ है समयबद्ध आचरण। ज्ञान का खतरा अहंकार में है और भक्ति का आलस्य में। इसलिए हनुमानचालीसा की पहली पंक्ति से सीखा जाए फल की आकांक्षा, आसक्ति भले ही न रखी जाए किन्तु परिणाम के प्रति तत्परता, सजगता जरूर रखी जाए। जब हम फल की उपलब्धि को समझ लेंगे तो प्रयासों के महत्त्व को भी जानकर ठीक से कार्य कर सकेंगे।
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कॉरपोरेट जीवन में प्रगति के गुर

कॉरपोरेट जीवन में प्रगति के गुर

Source: Career Mantra 


जब कॅरियर की बात आती है तो हर कोई अपनी भूमिका और जवाबदेही के लिहाज से आगे बढ़ना चाहता है। शिखर पर पहुंचने की राह कठिन जरूर है, लेकिन सही तौर-तरीके और कार्य संस्कृति को अपनाकर तेजी से इस दिशा में कदम बढ़ाए जा सकते हैं। यहां कुछ ऐसी बातें पेश हैं, जिनके जरिए आप अपने सहकर्मियों व वरिष्ठ अधिकारियों को प्रभावित कर सकते हैं।

मल्टीटास्किंग : आज के जटिल माहौल में मल्टीटास्किंग की उपयोगिता को नकारना मुश्किल है। बस ध्यान देने वाली बात यह है कि हर काम को सही तरह से और प्राथमिकतानुसार अंजाम दिया जाए। आपका लक्ष्य कम से कम करके रुक जाना नहीं होना चाहिए। अतिरिक्त कार्यभार तो लें, लेकिन यह भी ख्याल रहे कि इससे आपकी मौजूदा जिम्मेदारियां प्रभावित न हों।

नकारात्मकता से दूर : क्रोध, शिकायतें, इल्जाम लगाना, बुरा-भला कहने की आदत आपकी निर्णय क्षमता को प्रभावित करते हुए आपके काम पर नकारात्मक असर डाल सकती हैं। अपने सहकर्मियों का दोष निकालने से कोई फायदा नहीं होता। चुप रहें और अपने काम से काम रखें।

नेटवर्क बनाएं: नेटवर्क बनाना आज का मंत्र है। खुद को नेटवर्क में जरूर रखें। इसके लिए ऑफिस की मीटिंग, सहकर्मियों से बातचीत, दूसरी क्रियाओं और टीम लीडर्स के साथ सतत संपर्क बनाए रखें। अपने सहकर्मियों की लिस्ट को सिर्फ उसी फ्लोर तक सीमित न रखें, जहां आप बैठते हों। इस दायरे को आगे बढ़ाएं। यह काम वर्कशॉप और कांफ्रेंस के जरिए संभव है।

योग्यताएं बढ़ाएं : अपने मौजूदा काम के अलावा दूसरी योग्यताओं को हासिल करने की कोशिश करें, जिससे आगे जिम्मेदारियों का निर्वाह करने में मदद मिलेगी। ऐसी योग्यताओं को जानें और अध्ययन करें, जिन्हें हासिल करना कॅरियर के लिहाज से उचित है। इसके लिए लघु या अल्पकालिक कोर्स कर सकते हैं।

नियोजन : किसी भी काम को सफल व प्रभावी बनाने की मूल कड़ी है योजना बनाना। कोई नया काम, प्रोजेक्ट या पद मिलने पर एक निर्धारित समय के लिए एजेंडा तैयार कर लें। लाभ बढ़ाने, घाटा कम करने और प्रतियोगिता में बने रहने के नए-नए तरीके सोचें। इससे प्रमोशन के समय आप औरों से अलग खड़े नजर आएंगे।
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हैकिंग.. अच्छी भी

और भी हैं राहें
हैकिंग का नाम सुनते ही जहन में कंप्यूटर हैक करने वालों की नकारात्मक छवि सामने आती है। लेकिन एथिकल हैकिंग के रूप में इसका सकारात्मक आयाम भी है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि एथिकल (नैतिक) हैकर का काम काफी अर्थप्रद और चुनौतीपूर्ण है। अगर आप भी इस दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं, तो किसी प्रतिष्ठित संस्थान से ही इसका कोर्स करें। इंटरनेशनल डाटा कॉर्प (आईडीसी) द्वारा किए गए एक सर्वे में सामने आया है कि इस क्षेत्र में फिलहाल विश्वव्यापी स्तर पर तकरीबन ६क्,000 दक्ष पेशेवरों की दरकार है।

क्या है यह
सुरक्षा तो यूं भी महत्वपूर्ण पहलू है लेकिन जब दुनियाभर में मौजूद नेटवर्क की सुरक्षा की बात आती है, तो इस क्षेत्र में काम करने के बहुत से विकल्प बनते हैं। हैकिंग से साबका पड़ने वाले कई युवा, भले ही उनका वास्ता नकारात्मक ढंग से पड़ा हो, अब इस कॅरियर की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। इस क्षेत्र में काम देते वक्त कंपनियां आपकी योग्यता को बखूबी परखती हैं। बस यह ध्यान रखना है कि आपके कांट्रैक्ट की शर्ते ठीक हों।

सुरक्षा की आवश्यकता
आज के समय में सुरक्षा बहुत बड़ा मुद्दा हो गई है। यह बात साइबर स्पेस पर भी लागू होती है। नेटीजंस (नेट की दुनिया में रहने वाले) के तौर पर हमारा वास्ता साइबर स्पेस से जुड़े कई तरह के विकल्पों से पड़ता है। इसमें ई-कॉमर्स, कोलेबरेटिव कंप्यूटिंग, ई-मेल इत्यादि शामिल हैं।

कहां है जरूरत
एथिकल हैकर्स की जरूरत सरकारी संस्थानों, निजी व सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और सामान्य नागरिकों को भी होती है। उपरोक्त सभी लोगों को खतरा होता है कि कोई हैकर उनका वेब सर्वर क्रेक कर लेगा, उनके लोगो को पोर्नोग्राफी से बदल देगा, व्यक्तिगत ई-मेल पढ़ेगा, ऑनलाइन शॉपिंग साइट से क्रेडिट कार्ड का नंबर चुरा लेगा या फिर किसी सॉफ्टवेयर के जरिए कंपनी की गोपनीय बातें इंटरनेट पर जारी कर देगा। इससे बचने के लिए वे एथिकल हैकर्स की मदद लेते हैं।

खतरा
हैकिंग अगर नकारात्मक रूप से प्रयोग की जाए तो चंद मिनटों में एक बार के अनुचित हस्तक्षेप से ये किसी कंपनी को लाखों डॉलर का नुकसान पहुंचा सकती है। नेट पर आश्रित कई लोगों को हैकर्स से बड़ा खतरा है। पिछले कुछ वर्षो में हैकिंग या इससे जुड़ी समस्याओं में जबरदस्त बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। ऐसा होने पर ई-मेल एकाउंट हैक होने, आवश्यक डाटा चोरी होने, एड्रेस बुक कॉपी होने, वायरस, पासवर्ड अटैक, स्पूफ्ड मैसेज और अभद्र ई-मेल मिलने की स्थिति बन सकती है। एथिकल हैकर्स इंटरनेट से जुड़ी इन समस्याओं के लिए कड़ा सुरक्षाचक्र तैयार करते हैं।

महत्ता
एथिकल हैकर्स को व्हाइट हैट भी कहते हैं। ये एक तरह से अनुमति प्राप्त कर कंप्यूटर सिस्टम को मजबूत किए जाने के लिए एंटी हैकिंग तकनीक या इसका तोड़ विकसित करते हैं। ये कंप्यूटर क्रिमिनल्स के कदमों को पहले भांपकर उनके अटैक करने से पहले ही सुरक्षाकवच तैयार कर लेते हैं। मशहूर कंप्यूटर सिक्युरिटी विशेषज्ञ अंकित फाड़िया अपनी किताब में लिखते हैं, ‘कंप्यूटर हैकर्स मोटे तौर पर सेंधमार को पकड़ने के लिए उसी के अनुसार सोचने की प्रणाली पर कार्य करते हैं। इसी तरह हैकर्स से एक कदम आगे बढ़ते हुए सिस्टम की सुरक्षा की जा सकती है।’

योग्यता
एथिकल हैकर बनने के लिए कंप्यूटर-सैवी और नए-नए गैजेट्स का शौकीन होना महत्वपूर्ण है। आपको कंप्यूटर, इंटरनेट की दुनिया और नेटवर्किग व प्रोग्रामिंग की मूलभूत जानकारी होनी चाहिए। एथिकल हैकिंग व साइबर क्राइम की दुनिया से भी खुद को अपडेट रखना इसके लिए जरूरी है।

पारिश्रमिक
भारत में एथिकल हैकर्स का पारिश्रमिक 3-4.5 लाख रुपए प्रतिवर्ष का हो सकता है। जबकि विदेशी कंपनियों के लिए कार्य कर रहे लोगों की वार्षिक आय का आंकड़ा 27-32 लाख रुपए तक हो सकता है।
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नोकिया फोन पर उपलब्ध है इग्नू का इंग्लिश कोर्स

नोकिया फोन पर उपलब्ध है इग्नू का इंग्लिश कोर्स
नई दिल्ली, एजेंसी

दूरस्थ शिक्षा में आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की अपनी पहल के तहत इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) ने मंगलवार को नोकिया फोन के 'ओवी लाइफ टूल्स' के जरिए इंग्लिश का एक सर्टिफिकेट कार्यक्रम शुरू करने की घोषणा की।
इग्नू के उपाध्यक्ष वी.एन. राजशेखरन पिल्लई ने संवाददाताओं से कहा, ''शुरुआत में हम महाराष्ट्र के छह जिलों में यह कार्यक्रम शुरू करेंगे। छह महीने बाद लोगों की इसके लिए प्रतिक्रिया जानने के बाद हम राष्ट्रीय स्तर पर यह शुरुआत करेंगे।''
इग्नू ने इस कार्यक्रम को उपलब्ध कराने के लिए नोकिया के साथ एक रणनीतिक समझौता किया है।
पिल्लई ने कहा, ''हम इस कार्यक्रम के लिए नोकिया के साथ एक विशेष समझौता कर रहे हैं। बड़े पैमाने पर शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए किया गया यह अपनी तरह का पहला सहयोगात्मक समझौता है।'' उन्होंने कहा कि देश में शिक्षा की उन्नति और प्रचार-प्रसार के लिए अन्य कंपनियों के साथ भी ऐसे समझौते किए जाएंगे।
इंग्लिश में छह महीने की अवधि का यह सर्टिफिकेट कार्यक्रम अगले साल जनवरी में शुरू होगा। इसके तीन अलग स्तर होंगे। इनमें रोजमर्रा के जीवन में अंग्रेजी, शिक्षा में अंग्रेजी और कार्यस्थल पर अंग्रेजी शामिल है। इस कोर्स में 1,900 रुपये का खर्च आएगा।
नोकिया इंडिया के प्रबंध निदेशक डी. शिवकुमार का कहना है कि उनकी कंपनी ने देश में शिक्षा के प्रचार-प्रसार की एक नई पहल की है।
नोकिया ने जून 2009 में 'ओवी लाइफ टूल्स' सेवा जारी की थी। इसके तहत कृषि, शिक्षा और मनोरंजन सेवाएं दी जाती हैं। इस पर अंग्रेजी के अलावा हिंदी, मलयालम, कन्नड़, तमिल, तेलुगू, पंजाबी, मराठी, बांग्ला, गुजराती और उड़िया भाषा में सेवाएं उपलब्ध रहती हैं।
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Wednesday, September 1, 2010

डिस्टेंस-एजुकेशन दूर करें दूरी

इन दिनों तेजी से बदलते समय का प्रभाव हर चीज पर पड रहा है। और इससे शिक्षा का क्षेत्र भी अछूता नहीं है। यही वजह है कि शिक्षा के स्वरूप, उद्देश्य और यहां तक कि शिक्षा के माध्यमों में भी काफी बदलाव देखा जा सकता है। परिणामस्वरूप इन दिनों सरकार न केवल शिक्षण-संस्थानों की संख्या में बढोत्तरी करने जा रही है, बल्कि शिक्षा रोजगारपरक भी हो, वह इस दिशा में भी पुरजोर कोशिश कर रही है। और सरकार की इस कोशिश में रेगुलर स्टडी सिस्टम ही नहीं, बल्कि ओपेन यूनिवर्सिटीज व डिस्टेंस लर्निग सेंटर्स भी अपना-अपना अहम रोल अदा कर रहे हैं। डिस्टेंस एजुकेशन सेंटर्स की पहुंच और लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूट्स के प्रति पांच स्टूडेंट्स में से एक स्टूडेंट डिस्टेंस लर्निग सेंटर्स से जुडे होते हैं। डिस्टेंस एजुकेशन काउंसिल के मुताबिक, आगामी पांच सालों में देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में दाखिले के प्रतिशत को 10 से 15 प्रतिशतकरने के राष्ट्रीय लक्ष्य को पूरा करने में डिस्टेंस लर्निग मोड का योगदान उल्लेखनीय होगा। 


लोकप्रिय क्यों ?

यदि यह कहें कि शिक्षा सबके लिए और सबको मिले समयानुकूल शिक्षा-सरीखे उद्देश्य को आज डिस्टेंस लर्निग सेंटर्स भली-भांति पूरा कर रहे हैं, तो शायद गलत नहीं होगा। दरअसल, न केवल इन एजुकेशन सेंटर्स की फीस सस्ती होती है, बल्कि इनके छोटे-छोटे शहरों में मौजूद होने के कारण इनकी पहुंच का दायरा भी काफी बृहत होता है। और सबसे बडी बात, जिसकी वजह से डिस्टेंस एजुकेशन की लोकप्रियता में दिन-ब-दिन इजाफा होता जा रहा है, वह है इसमें तकनीकी साधनों का इस्तेमाल किया जाना। दरअसल, आज डिस्टेंस एजुकेशन कॉरेस्पॉन्डेंस मैटीरियल्स तक ही सीमित नहीं रह गया है, बल्कि स्टूडेंट्स अब टेलिकॉन्फ्रेंसिंग और मोबाइल के माध्यम से ंडिस्टेंस एजुकेशन का लाभ भी काफी करीब से उठा रहे हैं।

प्रमुख कोर्सेज

आज देश भर में लगभग 14 ओपेन यूनिवर्सिटी मौजूद हैं। इसके अलावा, 54 से अधिक डिस्टेंस लर्निग  सेंटर्स भी हैं। इन संस्थानों से आप न केवल डिग्री कोर्स (ग्रेजुएट, पीजी, एमफिल, पीएचडी), बल्कि विभिन्न विषयों में प्रोफेशनल कोर्सेज (सर्टिफिकेट या डिप्लोमा) भी कर सकते हैं। कुछ महत्वपूर्ण कोर्सेज, जो आज छात्रों के बीच काफी पॉपुलर हैं, वे हैं..
पोस्ट ग्रेजुएट कोर्सेज
मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन
  मास्टर ऑफ एजुकेशन 
मास्टर ऑफ लाइब्रेरी ऐंड इन्फॉर्मेशन साइंस 4मास्टर ऑफ टूरिज्म मैनेजमेंट आदि।
बैचलर कोर्सेज
बैचलर ऑफ लॉ
बैचलर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन
बैचलर ऑफ फिजिकल एजुकेशन 
बैचलर ऑफ साइंस इन नर्सिग
बैचलर ऑफ सोशल वर्क आदि।
सर्टिफिकेट कोर्सेज
सर्टिफिकेट इन कम्प्यूटर ऐप्लिकेशन 
सर्टिफिकेट इन कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग
सर्टिफिकेट इन फूड न्यूट्रिशन
सर्टिफिकेट इन डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स
सर्टिफिकेट इन कम्युनिकेटिव इंग्लिश आदि।
पीजी डिप्लोमा कोर्सेज
पीजी डिप्लोमा इन एग्रिकल्चरल मार्केटिंग
पीजी डिप्लोमा इन बैंकिंग ऐंड फाइनैंस 
पीजी डिप्लोमा इन मार्केटिंग मैनेजमेंट
पीजी डिप्लोमा इन एन्टरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग
पीजी डिप्लोमा इन एक्सपोर्ट मैनेजमेंट
पीजी डिप्लोमा इन कॉर्पोरेट लॉ आदि।
डिप्लोमा कोर्सेज
डिप्लोमा इन अप्लॉयड इलेक्ट्रॉनिक्स
डिप्लोमा इन फैशन डिजाइन ऐंड बूटिक मैनेजमेंट
डिप्लोमा इन डेयरी मार्केटिंग
डिप्लोमा इन इन्फॉर्मेशन साइंस
डिप्लोमा इन टूरिज्म इंडस्ट्री आदि।

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प्रोबेशनरी क्लेरिकल परीक्षा

बैंकिंग सेक्टर हमेशा से लोगों का पसंदीदा करियर डेस्टिनेशन रहा है। कम्प्यूटर आने के बाद बैंकिंग सेक्टर में काम करने का अंदाज भी काफी बदला है। यही कारण है कि युवा इस सेक्टर की ओर काफी संख्या में आकर्षित हो रहे हैं। यदि आप भी बैंक में नौकरी करना चाहते हैं, तो यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया ने हाल ही में प्रोबेशनरी क्लर्क पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं। कुल पदों की संख्या 700 है। ऑनलाइन आवेदन करने की अंतिम तिथि 22 सितंबर तथा परीक्षा की तिथि 28 नवंबर, 2010 है।
शैक्षिक योग्यता
यूनाइटेड बैंक में प्रोबेशनरी क्लर्क पदों के लिए अभ्यर्थियों को किसी मान्यताप्राप्त बोर्ड या संस्थान से बारहवीं में कम से कम 60 प्रतिशत अंक या किसी भी विषय में स्नातक की डिग्री अनिवार्य है। इसके साथ ही मान्यताप्राप्त संस्थान से कम से कम तीन महीने का कम्प्यूटर कोर्स अवश्य किया हुआ हो।
उम्र सीमा
सामान्य अभ्यर्थियों के लिए उम्र 18 से 28 वर्ष निर्धारित है, तो वहीं एससी, एसटी, ओबीसी तथा विकलांग उम्मीदवारों के लिए अधिकतम उम्र सीमा में छूट का प्रावधान है।
परीक्षा का स्वरूप
लिखित परीक्षा का पहला भाग वस्तुनिष्ठ प्रश्नों पर आधारित होगा, जिसमें रीजनिंग, क्लेरिकल एप्टीटयूड, क्वांटेटिव एप्टीटयूड और जेनरल इंग्लिश से संबंधित प्रश्न पूछे जाएंगे। गलत उत्तर देने पर निगेटिव मार्किग का भी प्रावधान है। दूसरे भाग में विवरणात्मक प्रश्न शामिल होंगे। लिखित परीक्षा में सफल होने के बाद साक्षात्कार के लिए बुलाया जाएगा। इसमें सफल होने के बाद अभ्यर्थी का अंतिम रूप से चयन किया जाएगा।
कैसे करें तैयारी
इस परीक्षा में यदि प्रश्नों को तेजी और शुद्धता से हल करने की आदत नहीं है, तो अधिकांश प्रश्नों का जवाब दे पाना संभव नहीं है। ऐसी स्थिति से बचने के लिए अधिक से अधिक संख्या में प्रश्नों को हल करने का अभ्यास करें और शुद्धता का भी पूरा ध्यान रखें। चूंकि प्रश्न वस्तुनिष्ठ प्रकार के होते हैं, इसलिए उन्हें शॉर्टकट फार्मूले से हल करने का प्रयास करें।
सभी खंडों पर ध्यान दें
बैंकिंग सर्विसेज क्रॉनिकल के प्रभात नंदन कहते हैं कि जेनरल इंग्लिश में विशेष रूप से ग्रामर, कॉम्प्रिहेंशन, वोकैबलरी आदि से प्रश्न पूछे जाते हैं। इस खंड में कॉम्प्रिहेंशन से लगभग 10-15 प्रश्न पूछे जाते हैं। लगभग 10-10 प्रश्न कॉमन एरर और अन्य से पूछे जाते हैं। समान संख्या में समानार्थक, विपरीतार्थक तथा सेंटेंस अरेंजमेंट से प्रश्न होंगे। इसके अलावा इडियम/फ्रेजेज, सेंटेंस को इंप्रूव करने तथा कभी-कभार स्पेलिंग एरर से भी प्रश्न पूछे जाते हैं। इस खंड के प्रश्नों को हल करने के लिए फंडामेंटल ग्रामर की जानकारी बहुत जरूरी है। नियमित अभ्यास के लिए अंग्रेजी की पुस्तकों व पत्र-पत्रिकाओं का अध्ययन करना लाभकारी साबित हो सकता है। इसके अलावा रेन ऐंड मार्टिन की ग्रामर की पुस्तक भी समान रूप से उपयोगी हो सकती है। यह खंड परीक्षा की दृष्टि से सबसे कम समय लेने वाला होता है। इस खंड से समय बचाकर कठिन खंडों रीजनिंग व क्वांटेटिव एप्टीट्यूड में लगाना लाभकारी हो सकता है। क्वांटेटिव एप्टीट्यूड में अधिकांश प्रश्न अंकगणितीय सूत्रों से हल होने वाले होते हैं। इसमें संख्यात्मक गणनाओं, जैसे संख्यात्मक तर्क संगतता एवं आलेखों से निष्कर्ष निकालने से संबंधित प्रश्न होते हैं।
प्रत्येक प्रश्न को सावधानीपूर्वक पढकर उसका सही उत्तर देना चाहिए। इसके अलावा दशमलव, भिन्न, संख्या पद्धति, चक्रवृद्धि व साधारण ब्याज, प्रतिशत, लाभ और हानि, समय और दूरी से संबंधित प्रश्न भी पूछे जाते हैं। इस खंड की तैयारी के दौरान विशेष सूत्रों को याद करने तथा प्रश्नों को शॉर्टकट तरीके से हल करने में समय देना चाहिए। जहां सूत्रों की जानकारी से प्रश्नों का सर्वशुद्ध हल किया जा सकता है, वहीं शॉर्टकट तरीके से प्रश्नों को हल कर कम समय में अधिक से अधिक प्रश्नों को हल किया जा सकता है। बैंक परीक्षाओं के तर्कशक्ति परीक्षण वाले प्रश्नों का स्टैंडर्ड थोडा कठिन होता है। इसमें दो प्रकार के प्रश्न होते हैं- वर्बल और नॉन वर्बल। वर्बल से लगभग 25-35 प्रश्न पूछे जाते हैं, जबकि नॉन वर्बल से 15-25 प्रश्न पूछे जाते हैं। दोनों प्रकार के प्रश्नों में श्रृंखला, वर्गीकरण, सादृश्यता आदि से प्रश्न होते हैं। इसके अलावा शाब्दिक खंड से रक्त संबंधित प्रश्न, कथन व निष्कर्ष से संबंधित प्रश्न भी पूछे जाते हैं। इसके लिए बाजार में उपलब्ध किसी स्तरीय पुस्तक से अध्ययन करना लाभकारी हो सकता है। इस खंड के प्रश्नों की तैयारी के लिए नियमित प्रैक्टिस बहुत जरूरी है।
बनाएं अलग स्ट्रेटेजी
आप अपनी तैयारी को सामूहिक प्रैक्टिस के जरिए सरल बना सकते हैं। यदि आप दो-चार के ग्रुप में तैयारी कर रहे हैं, तो कम समय में कठिन और आसान प्रकार के खंडों की तैयारी की जा सकती है। सामूहिक अध्ययन से एक-दूसरे की खामियों का पता चलता है, जिससे परीक्षा हॉल में होने वाली गलतियों से बच सकते हैं। ग्रुप बनाते समय इस बात का अवश्य ध्यान रखें कि आपके सहयोगी अलग-अलग विषयों में दिलचस्पी रखने वाले या विशेषज्ञता हासिल करने वाले हों।
टाइम मैनेजमेंट
इसका महत्व न सिर्फ तैयारी में है, बल्कि परीक्षा हॉल में भी महत्वपूर्ण भूमिका है। अभ्यास के दौरान अलग-अलग तरह के प्रश्नों के लिए एक समय सीमा निर्धारित करनी चाहिए। इससे परीक्षा में प्रश्न छूटने की आशंका कम होगी।
सुविधा के लिए तैयारी को कई चरणों में बांट लेना चाहिए। किस वक्त किस विषय को प्राथमिकता देनी चाहिए, यह खुद निर्धारित करें।
आधारभूत जानकारी के अलावा अधिकाधिक प्रश्नों को हल करने की प्रैक्टिस भी करनी चाहिए। इसके लिए निर्धारित समय सीमा में पूर्व परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों का अभ्यास करना अच्छा रहता है। इससे टाइमिंग भी सही होगी और परीक्षा के पैटर्न की भी जानकारी मिलेगी। इस दौरान हर प्रश्न की सही तकनीक और शॉर्टकट विधि ईजाद करनी चाहिए। 60 प्रतिशत प्रश्नों के पैटर्न पिछली परीक्षाओं से मिलते-जुलते होते हैं। अत: इससे परीक्षा में पूछे जाने वाले अधिकांश प्रश्नों के पैटर्न से वाकिफ हुआ जा सकता है। यदि आप लिखित परीक्षा में सफल होते हैं, तो आपको इंटरव्यू के लिए बुलाया जाएगा। यदि बेहतर करने में सफल होते हैं, तो आपका प्रोबेशनरी क्लर्क के लिए चयन हो सकता है। अधिक जानकारी के लिए वेबसाइट www.unitedbankof india.com है।
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पॉवर ड्रेसिंग

पावर ड्रेसिंग का मतलब ऐसा ड्रेस अप है, जिससे आपकी छवि उस सफल कामकाजी व्यक्ति की बन सके जो आप हैं या आप वास्तव में होना चाहते हैं। आपमें जो सामर्थ्य है, जो शक्ति है, वह सली के से पहनी गई पोशाक में कहीं बेहतर ढंग से नजर आती है। उदाहरण के लिए, यदि आप मीटिंग के दौरान शालीन सूट में हैं तो आप तन कर खड़े होंगे, सामने वाले की आंखों से आंखें मिला कर बातें कर सकेंगे और हाथ मिलाने का आपका अंदाज भी दमदार होगा। चाहे नए जॉब की बात हो या पदोन्नति का मामला हो, उन लोगों के पहनावे का आकलन सूक्ष्मता से करें जो उस जॉब या उस पद पर पहले से हैं। कॉरपोरेट वर्ल्ड या कारोबारी जगत में आपके ड्रेस सेंस से बॉस को यह स्पष्ट होता है कि आप किसी जिम्मेदारी को संभालने के प्रति कितने तत्पर हैं। पहनावे से संबंधित निम्न बातों पर ध्यान देकर आप एक पावरफुल प्रोफेशनल के रूप में अपनी छवि बना सकते हैं।

-आप जो हैं, उसके अनुरूप पोशाकें न धारण करें, बल्कि आप जिस स्थिति में खुद को देखना चाहते हैं, उसके अनुसार खुद को तैयार करें। उन लोगों के ड्रेस सेंस को देखें जो अपने कैरियर के टॉप पर हैं और उनसे आइडिया लें। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि आप किसी की नकल करें, बल्कि पहनावे के उनके अंदाज से प्रेरित हों और उसको अपने ऑफिस ड्रेस का अंग बनाते हुए अपना व्यक्तिगत स्टाइल विकसित करें।
-जॉब ढूंढ़ते वक्त या साक्षात्कार के लिए जाते वक्त जो निर्धारित ड्रेस कोड है, वहीं पहनें, यानी बिजनेस फॉरमल। हां, यदि आप किसी क्रिएटिव जॉब केलिए जा रहे हैं तो कैजुअल आजमा सकते हैं। तब आपसे ऐसे पहनावे की अपेक्षा भी की जाती है। बिजनेस फॉरमल गहरे रंग का, जैसे ब्लैक, ग्रे, नेवी, ब्राउन आदि होना चाहिए।
-ड्रेस के साथ जरूरी एक्सेसरीज ही होनी चाहिए। घड़ी, पेन, ज्वेलरी, बैग आदि सभी चीजों में शालीनता झलकनी चाहिए। ज्यादा रंगीन और चमकदार एक्सेसरीज न हों। अपने फुटवियर पर खास ध्यान दें, जिसका आपके पहनावे से मेल खाना जरूरी है।
-बाल सामान्य और सलीके से संवरे होने चाहिए। नाखूनों की सफाई पर खास तौर पर ध्यान दें। आजकल बालों को रंगीन करने का चलन है, पर इंटरव्यू के दौरान इससे परहेज रखें।
-इंटरव्यू के लिए जाते वक्त कुछ भी ऐसा न पहनें, जिसमें आप असहज महसूस करें। जॉब की जरूरत का ध्यान रखते हुए वैसा पहनें जो आप पर सूट करता हो। कुल मिलाकर पावर ड्रेसिंग का तात्पर्य यह है कि इंटरव्यू के दौरान आप आत्मविश्वास से भरे नजर आएं। तभी सफलता आपके करीब आएगी।
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